गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013
एक अनोखा यात्रा वृतान्त
सुनाती हूँ आप सबको एक मजेदार यात्रा वृतान्त ।
एक ट्रेन यात्रा के दौरान, मुलाकात हो गई हमारे एक भूतपूर्व बॉस से श्रीमान ,
हमने कहा सर जी प्रणाम , बाल बच्चों के क्या हाल चाल,
सर जी थोड़ा मुस्कराए फिर बोले
" ईश्वर ने दये हैं लड़का गिनती के चार ,
दो हैं सेंट्रल जेल में दो चल रहे फरार .."
हम भी मुस्कराए , तो बॉस बोले ,
समझदार हैं आप भी हमारी भूतपूर्व एम्प्लोयी ,
हमने फिर कह ही डाला
बॉस आपको हो ढेरों बधाई
आपके सुपुत्रों ने खूब तरक्की है पाई ,
सर जी बोले हमने तो बस अपनी जिम्मेदारी निभाई
अपने बच्चों को वो तालीम दिलाई
जिसमे है सबसे ज्यादा कमाई।
सर जी गदगद होकर बोले ,
हमारे भी दिन बदलने वाले हैं बच्चे ,
कई दलों से आ रहे हैं लड़कों को चुनाव लड़वाने के लिए पर्चे ,
अब हमारे घर में एक नहीं दो नहीं पूरे चार चार मंत्री होंगे ...
अपनी तो ऐश है , अब तो बस लाइफ सेट है।।
बस तिजोरियां खरीदने जा रहा हूँ।।
हमने भी मौका देख के चौक लगा ही डाला ,
किस ज़माने हैं सर जी,
अब खरबो तिजोरियों में नहीं स्विस बैंक में रहा करते हैं।
तभी बगल में बैठे सहयात्री को भी बातचीत में इंटरेस्ट आया
और उन महाशय ने भी सर जी से कुछ इस तरह फ़रमाया
तो अब आप भी राजनैतिक परिवार बनने वाले हैं,
तो फिर साम्प्रदायिकता के बारे में क्या कहने वाले हैं
फिर क्या था , सर जी में भी राजनैतिक कीड़ा घुस आया
और उन्होंने तपाक से एक शेर फ़रमाया ,
"तुम मुसलमान हम हिन्दू , तो फिर लड़ने के क्या बिंदु"
हम भी थोड़ा मुस्कराए और बोले सर जी ,
"तुम मुसलमान हम हिन्दू , बस यही तो हैं लड़ने के बिंदु "
और राजनेता ही तो करते हैं , तुम मुसलमान हो ... और तुम हिन्दू ,
और हम बनते रहें अरबपति
इसलिए लड़ते रहो ,
जब तक आसमान में है इंदु।
तभी बॉस जी बोले हमारा स्टेशन आने वाला है।
हमने भी कहा चलिए बाय फिर मिलेंगे
आपको आल द बेस्ट " आपका वक्त बदलने वाला है।
कीर्ति दीक्षित
सोमवार, 29 अक्टूबर 2012
कद बढ़ रहा मकान का
1.इन्सान छोटा हो रहा
और कद बढ़ रहा मकान का
आसमान को भेद दें
हमने बना दी दीवारें इतनी बड़ी
रेंगती चीटियों से लगते हैं
जो सोये हैं आसमान की छत तले
आप उतने बड़े हैं
जितना कद बड़ा है
आपके मकान का
इन्सान छोटा हो रहा
और कद बढ़ रहा मकान का।
2. जिसका हुआ जितना गगनचुम्बी आशियाना
वो उतना बड़ा है
और छोटे हैं वो
जिनका घर छोटी सी गलियों में पड़ा है .
3. कल हुआ करती थी पहचान इन्सान की
आज अहमियत होती है मकान की
अब ऊचाई ताकती है ऊँची खिड़कियों से
और छोटी हो रही कीर्ति इन्सान की
4. कितनी ही बुलन्द हो इंसानियत इन्सान की
आज कीमत है सिर्फ ऊचे मकान की
आज वनवासी राम भी दर दर भटकते हैं
राजनीति की आग में पल पल झुलसते हैं
आज कीमत है उसी भगवान की
जितनी ऊचाई हो मंदिर के मचान की .
सोमवार, 22 अक्टूबर 2012
पक्के आँगन की मिटटी

पक्के आँगन में मिटटी क़ा ढेला था .
बिखरे बिखरे कुछ फूल थे उपेक्षित
टूटे ,मुरझाए , सूखे, मर चुके
मिटटी का भी न था कोई म़ोल मृत फूलों की कब्र बना दी मिटटी मे
दिन बीते रातें बीती भोर बीते
पर उस दिन हुआ नया भुन्सारा
सब कुछ वही था पर
वहां कोने में कुछ नया था
छिपा छिपा सा खिला खिला सा
नन्हा नन्हा उज्जवल उज्जवल
प्रकृति के रंग से धुला धुला
मृदा में खेल रहा था
जीवन मृत में अंकुर फुट था
एक नूतन आकर लिए
नव पल्लव साकार लिए
मेरे पक्के आँगन में जीवन अंकुर फूटा था
सोमवार, 27 अगस्त 2012
ALHAD CHIDIYA: save water.. edited & scripted...
ALHAD CHIDIYA:
save water..
edited & scripted...: save water.. edited & scripted by kirti dixit...
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ALHAD CHIDIYA: Alhad chidiya ki kahani.... dard...
ALHAD CHIDIYA:
Alhad chidiya ki kahani....
dard...: Alhad chidiya ki kahani.... dard
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